29-September-2022

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भागलपुर: माघी पूर्णिमा के मौके पर गंगा घाटों पर लाखों श्रद्धालुओं ने लगाई आस्था की डुबकी।

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भागलपुर: माघी पूर्णिमा पर भागलपुर के विभिन्न गंगा घाटों पर बड़ी संख्या में पहुंचकर श्रद्धालुओं ने आस्था की डुबकी लगाई , भागलपुर बांका नवगछिया सहित आसपास के कई जिले और पड़ोसी राज्य झारखंड के कई जिलों से पहुंचे लोगों ने गंगा स्नान किया , आज के दिन दान ,पुण्य और स्नान करने का विशेष महत्व होता है. कहा जाता है कि माघी पूर्णिमा या माघ पूर्णिमा के दिन चन्द्रमा अपनी पूर्ण कलाओं के साथ उदित होता है. हिन्दू धर्म में पूर्णिमा तिथि का विशेष महत्व होता है. कहा जाता है कि इस दिन पवित्र गंगा नदी में स्नान करने, दान और ध्यान करने से पुण्य फलों की प्राप्ति होती है.साथ ही इस दिन भगवान विष्णु की पूजा की जाती है.

भागलपुर के गंगा तटों पर सुरक्षा के पुक्ता इंतजाम.

माघी पूर्णिमा पर गंगा स्नान करने भागलपुर के गंगा तटों पर उमरने वाले श्रद्धालुओं की भीड़ को देखते हुए जिला प्रशासन के द्वारा सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए थे, प्रत्येक गंगा तट पर दंडाधिकारी के साथ पुलिस बलों की तैनाती की गई थी ,साथ ही एसडीआरएफ की टीम कमांडेंट गणेश जी ओझा के नेतृत्व में लगातार बोट से भ्रमण करते हुए लोगों को सावधानीपूर्वक गंगा स्नान करने को लेकर जागरूक करते दिखे, इस दौरान एसडीआरएफ के कमांडेंट ने बताया कि जिलाधिकारी सुब्रत कुमार सेन के निर्देश पर सुल्तानगंज से कहलगांव तक गंगा नदी पर सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए जाने की बात कही…

माघ पूर्णिमा व्रत की कथा:…

पौराणिक कथा के अनुसार, कांतिका नगर में धनेश्वर नाम का ब्राह्मण निवास करता था. वह अपना जीवन निर्वाह दान पर करता था. ब्राह्मण और उसकी पत्नी के कोई संतान नहीं थी. एक दिन उसकी पत्नी नगर में भिक्षा मांगने गई, लेकिन सभी ने उसे बांझ कहकर भिक्षा देने से इनकार कर दिया. तब किसी ने उससे 16 दिन तक मां काली की पूजा करने को कहा, उसके कहे अनुसार ब्राह्मण दंपत्ति ने ऐसा ही किया. उनकी आराधना से प्रसन्न होकर 16 दिन बाद मां काली प्रकट हुई. मां काली ने ब्राह्मण की पत्नी को गर्भवती होने का वरदान दिया और कहा, कि अपने सामर्थ्य के अनुसार प्रत्येक पूर्णिमा को तुम दीपक जलाओ. इस तरह हर पूर्णिमा के दिन तक दीपक बढ़ाती जाना जब तक कम से कम 32 दीपक न हो जाएं,ब्राह्मण ने अपनी पत्नी को पूजा के लिए पेड़ से आम का कच्चा फल तोड़कर दिया. उसकी पत्नी ने पूजा की और फलस्वरूप वह गर्भवती हो गई. प्रत्येक पूर्णिमा को वह मां काली के कहे अनुसार दीपक जलाती रही. मां काली की कृपा से उनके घर एक पुत्र ने जन्म लिया, जिसका नाम देवदास रखा. देवदास जब बड़ा हुआ तो उसे अपने मामा के साथ पढ़ने के लिए काशी भेजा गया. काशी में उन दोनों के साथ एक दुर्घटना घटी जिसके कारण धोखे से देवदास का विवाह हो गया. देवदास ने कहा कि वह अल्पायु है परंतु फिर भी जबरन उसका विवाह करवा दिया गया. कुछ समय बाद काल उसके प्राण लेने आया लेकिन ब्राह्मण दंपत्ति ने पूर्णिमा का व्रत रखा था, इसलिए काल उसका कुछ बिगाड़ नहीं पाया. तभी से कहा जाता है कि पूर्णिमा के दिन व्रत करने से संकट से मुक्ति मिलती है और सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं.